ब्रेकिंग न्यूज़:- मनरेगा कार्यों में धांधली की शिकायत करने पर होती है फर्जी जांच
विगत कई महीनों से मनरेगा मजदूरी के काम में बड़े पैमाने पर होने वाली मजदूरी के काम में धांधली की शिकायत किए जाने पर जांच अधिकारी द्वारा जब मौके पर पहुंचकर जांच की जाती है तो वहां पर सबकुछ ठीक पाया जाता है।
मजदूरों को फावड़े और कड़ाही लेकर या फिर कंधे पर फावड़ा रख कर कतार में एक साथ खड़े रख कर फोटो भी खींच ली जाती है। लेकिन उन सभी फोटो को देख कर ही साफ साफ पता चलता है कि काम नहीं हो रहा है बल्कि काम होता हुआ दिखाने के लिए फोटो खींच ली गई है।
दरअसल जांच के लिए पहुंचने वाले अधिकारियों के द्वारा संबंधित गांव के ग्रामप्रधानों और सचिवों को पहले से ही गांव में पहुंचने के समय दिन और तारीख बता दिया जाता है।आनन फानन में तुरंत गांव के उन सभी महिलाओं पुरूषों को काम वाले स्थान पर बुलाया जाता है। और उन्हें एक साथ खड़े करके फोटो खींच ली जाती है और वीडियो बना ली जाती है। पहले से ही सिखाए पढ़ाए गए मजदूर रटा रटाया बयान दर्ज कराते हैं। अपने बयानों में सभी मजदूर एक साथ संबंधित ग्राम प्रधान की तारीफ करते हुए मनरेगा में हमेशा काम मिलते रहने और खूब तेजी से काम होने का दावा करते हैं। लेकिन देखते ही पता चलता है कि मिट्टी का काम करने वाले मजदूरों के शरीर पर मिट्टी का एक कण भी नहीं लगा है। कपड़े साफ सुथरे हैं कुदाल के नीचे सिर्फ थोड़ी सी मिट्टी की खुदाई हुई है। आसपास घांस उगी हुई है और कहीं पर भी पहले काम होने के कोई प्रमाण नजर नहीं आते हैं। लेकिन मजदूर चीख चीख कर कहते हैं कि हम रोज गांव में काम कर रहे हैं।
आइए बताते हैं कैसे होती है काम में धांधली
नाम न उजागर करने की शर्त पर मनरेगा मजदूरों ने बताया कि सरकार द्वारा मनरेगा के काम में मजदूरों को एक दिन के काम के बदले सिर्फ 237/-₹ प्रति मजदुर मजदूरी दी जाती है। जबकि बाजार में काम करने वाले नियमित मज़दूरों को 400 से 500 रूपये मिलते हैं। फिर भी गांवों में मनरेगा मजदूरों की भरमार है। सच यह कि
गांव के महिलाओं,पुरुषों और बेरोज़गार युवाओं की मनरेगा मजदूर के रूप में जॉब बनाकर उनका मस्टरोल भरकर हस्ताक्षर के बाद जमा कर दिया जाता है। मजदूरों के बैंक खाते में मजदूरी की रकम पहुंचते ही ग्राम प्रधानों के एजेंट उन सभी मजदूरों के घर पहुंचकर अथवा सीएचसी सेंटरों पर पहुंच कर मजदूरों के आधार और अंगूठे लगा कर मजदूरी की रकम निकाल ली जाती है।
मजदूरों को सिर्फ 10 फीसदी रकम देकर बाकी रूपए वापस ले लिए जाते हैं। इन रूपयों का मोटा कमीशन सचिव बीडीओ और मनरेगा कर्मचारियों को भी दिया जाता है सबसे अधिक हिस्सा ग्राम प्रधानों को मिलता है। पंजिकृत मजदूरों को घर बैठे हर महीने मुफ्त एक हजार से 1500 रूपए मिल जाते हैं मौके पर काम होता ही नहीं अथवा बहुत जरूरी होने पर जेसीबी मशीन लगा कर रात में या दिन में मौका देखकर चोरी छिपे महज दो तीन हजार खर्च करने के बाद मिट्टी की खुदाई जैसे काम आसानी से पूरा करा लिया जाता है।
यह सिलसिला वर्षों पुराना है यही वजह है कि मुफ्त रूपए पाने वाले ग्राम प्रधानों के चहेते फर्जी मजदूर भी अपनी जुबान नहीं खोलते। सच्चाई यह है कि यदि पारदर्शी तरीके से जांच हो तो गांवों में ऐसे मनरेगा मजदूर भी मिलेंगे जो कभी मजदूरी करते ही नहीं, मनरेगा मजदूरों में महिलाएं गृहणी हैं बेरोजगार पढ़े लिखे युवा हैं और कुछ प्राइवेट नौकरी रोजगार करने वाले लोग भी शामिल होते हैं।
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