नई दिल्ली | भारत की लगाम न्यूज़ :- समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजकुमार भाटी का एक वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। वीडियो में वह दिल्ली के अंबेडकर भवन में आयोजित धम्म दीक्षा समारोह के दौरान हिंदू देवी-देवताओं की पूजा और आस्था से संबंधित 22 प्रतिज्ञाओं का पाठ करते दिखाई दे रहे हैं। इस घटना के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में बहस तेज हो गई है।
20 अक्टूबर को कार्यक्रम में हुए थे शामिल
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, विजयादशमी के अवसर पर 20 अक्टूबर 2026 को दिल्ली के रानी झांसी रोड स्थित अंबेडकर भवन में भारतीय बौद्ध महासभा का कार्यक्रम आयोजित किया गया था। राजकुमार भाटी इसमें मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए थे। कार्यक्रम के दौरान बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर से जुड़ी 22 प्रतिज्ञाओं का पाठ किया गया, जिनमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश की पूजा नहीं करने संबंधी प्रतिज्ञा भी शामिल है।
कार्यक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद भाटी के धार्मिक विचारों और उनकी राजनीतिक भूमिका को लेकर सवाल उठने लगे।
धर्म परिवर्तन की अटकलों पर भाटी ने दी सफाई
विवाद बढ़ने पर राजकुमार भाटी ने स्पष्ट किया कि उन्होंने हिंदू धर्म नहीं छोड़ा है और न ही धर्म परिवर्तन करने का उनका कोई इरादा है। उन्होंने कहा कि वह सभी धर्मों, जातियों और समुदायों का सम्मान करते हैं तथा गौतम बुद्ध की शिक्षाओं और बाबा साहब आंबेडकर के विचारों से प्रभावित हैं।
भाटी ने यह भी कहा कि वह विभिन्न धर्मों के कार्यक्रमों में शामिल होते हैं और किसी भी धर्म में रहते हुए मानवता की सेवा की जा सकती है।
22 प्रतिज्ञाओं को लेकर उठे सवाल
इस मामले में सबसे अधिक चर्चा उस प्रतिज्ञा को लेकर हो रही है, जिसमें हिंदू देवी-देवताओं में विश्वास न रखने और उनकी पूजा न करने की बात कही गई है। भाटी ने अपने स्पष्टीकरण में तर्क दिया कि ये बाबा साहब से जुड़ी प्रसिद्ध 22 प्रतिज्ञाएं हैं और कार्यक्रम में उनकी मौजूदगी को धर्म परिवर्तन के रूप में पेश करना गलत है।
राजनीतिक बहस के केंद्र में आया मामला
राजकुमार भाटी की शपथ का वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर उनके समर्थन और विरोध में प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। एक ओर लोग धार्मिक आस्था से जुड़े सवाल उठा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भाटी के समर्थक इसे धार्मिक स्वतंत्रता और सभी धर्मों के कार्यक्रमों में भागीदारी का विषय बता रहे हैं।
फिलहाल, यह मामला धार्मिक आस्था, संवैधानिक स्वतंत्रता और राजनीतिक बयानबाजी को लेकर नई बहस का विषय बन गया है।
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