गोरखपुर सरकारी अस्पताल का रिव्यू : अस्पताल में है बगुला भगत, घुस को दक्षिणा समझता है पूरा स्टाफ़, एक दशक से अस्पताल का हुआ है काफ़ी विकास

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सदर अस्पताल गोरखपुर का रिव्यू :

अखिर क्यों चुने हम सरकारी अस्पताल

आज से 20 वर्ष पहले तक अधिकांस लोग सरकारी अस्पताल मे ही अपना इलाज करवाना चाहते थे. जिसका मुख्य कारण अधिकांश मात्रा में प्राइवेट अस्पतालों का ना होना था

लेकिन अब समय बदल गया है हर चौराहे शहर नुक्कड़ पर प्राइवेट अस्पताल का भरमार है. और लोग अपनी सुविधा अनुसार अपना पहला पसंद प्राइवेट अस्पताल और डॉक्टर को ही बना लिए हैं.

हम यहां प्राइवेट अस्पताल और डॉक्टर की बात ना करके केवल सरकारी अस्पताल और डॉक्टर के बारे में कुछ कसीदे पढ़ते हैं

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हां यह कटु सत्य है कि एक दशक पहले तक सरकारी अस्पताल केवल भगवान भरोसे ही चलते थे. भीड़ इतनी होती थी कि स्टाफ की कमी महसूस होती थी.

लेकिन आज हालात यह है कि गोरखपुर सदर अस्पताल हो या मेडिकल कॉलेज या फिर एम्स हर जगह भरपूर मात्रा में डॉक्टर नर्स और सफाई कर्मचारी उपलब्ध है और जो एक दशक पहले की जो भीड़ थी वह आज गायब है.

हमारे कहने का तात्पर्य यह है कि दो दशक पहले का लूट-खसोट घुस खोरी, मरीजो की अनदेखी, गंदगी को देख कर जो समाज और क्षेत्र के सम्भ्रान्त और बुद्धिजीवी लोग थे उन्होंने सरकारी अस्पतालों की तरफ से मुह मोड़ लिया.. उन्होंने तो पैसों के बल पर आज अच्छी सुविधा लेना शुरू कर दिया, पर अब सवाल यह उठता है की गरीब पिछड़े मजदूर जाए तो जाए कहा

आज हम केवल सदर अस्पताल गोरखपुर का 100 बेड वाला नया महिला चिकित्सालय परिसर की बात करेंगे

क्यों कि आज हम “Prince vidyarthi” एक सप्ताह तक इसी महिला अस्पताल में अपने परिवार का डिलेवरी “प्रश्वव” करवाने आए हुए थे. और यहाँ की नई हालत देखकर भौचक्के रह गये.

यह डिपार्टमेंट

इस सरकारी अस्पताल में डिलेवरी कराने का नुकसान और फायदे

सबसे पहले हम बता दे कि इस हास्पिटल को जगह की कोई कमी नहीं है. ढेर सारा पार्किंग एरिया है, तीन मंजिल तक स्लोप सीड़ी जिसपर मरीज़ आराम से चल कर या अपने निजी वाहन से जा सकता है. या फिर लिफ़्ट से जा सकता है, यहा तक कि जो नार्मल सीड़ी है चढ़ने उतरने की वह भी बहुत ज्यादा एरिया मे है. मरीज का प्रतिदिन बेड सिट चेंज होता रहता है, हर कार्य के लिए अलग-अलग डाक्टर, नर्स, सफाई कर्मचारी लगे हुए हैं, गेट पर सरकारी मिलिट्री वाले सिक्योरिटी में लगे हुए हैं, प्राइवेट सिक्योरिटी कंपनी वाले भी अस्पताल का देख रहे करते रहते हैं, इसलिए चोरी ना के बराबर है.

भोजन में नास्ता दूध, चावल दाल रोटी सब्जी इफ़रात मात्रा में सबके लिए उपलब्ध है. और खाना खिलाने वाले कुक लोग बड़े ही सज्जन लोग है, क्यों कि मरीजो की हालत को देखते हुए दाल भरपूर मात्रा में सभी महिलाओ को पूछ पूछ कर पिलाते है, पीने के लिये शुद्ध पानी है. एसी और पंखे स्थान स्थान पर लगे हुए हैं.

अगर आप गोरखपुर सदर महिला अस्पताल में बच्चा पैदा करवाने आते हैं तो आपको जन्म प्रमाण पत्र बनवाने के लिए दौड़ना नही पड़ेगा और सरकार की जो जननी योजना है जिसके तहत. पहले बच्चे पर, दूसरे बच्चे पर, लड़की पैदा होने पर जो पुरस्कार राशि है वह भी असानी से मिल जाता है. आपका आयुष्मान कार्ड भी बन सकता है अगर आप पात्रता की श्रेणी में आते होंगे तो

सफ़ाई देखकर तो आप दंग रह जाएंगे

हमे यह कहने मे थोड़ा भी गुरेज नहीं है की यह सभी बदलाव सरकार बदलने से ही बदला है,

अभी इस अस्पताल में ज्यादातर लोग सम्बीदा पर प्राइवेट नौकरी कर रहे हैं.अस्पताल के पास पर्याप्त मात्रा में मशीन उपलब्ध है.

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सिर्फ एक कमी है इस सरकारी अस्पताल में…?

लापरवाही के कारण जाती है लोगों की जान या होते हैं लोग परेशान.

बच्चा पैदा होने के बाद नाड़ा काटने से पहले ही वसूली सुरु कर देते हैं, जिससे कभी कभी माँ बच्चे के जान पर बात बन आती है.

अगर समाज के सम्भ्रान्त लोग पुनः सरकारी अस्पताल की तरफ झुकाव करे तो इस मामूली सी कमी को भी दूर किया जा सकता है.

घुसखोरी चरम पर है. 

बिना पैसा लिए कोई भी डॉक्टर नर्स या सफाई कर्मचारी एक काम नही करते है. चाहे वह संविदा वाले कर्मचारी हो या सरकारी

अस्पताल में है बगुला भगत 

सिर्फ़ वही लोग घुस नहीं लेते हैं. जिन को मौका नहीं मिलता है कहीं से. वरना हर पोस्ट पर लोग पैसा पकड़ने को तैयार बैठे हैं. उपर वाले उपर उपर झोल माल कर रहे हैं और नीचे वाले नीचे खेल रहे हैं.

घुस को दान समझता है अस्पताल का पूरा स्टांप 

जहा से मरीज को भर्ती करवाने के लिए फार्म भरा जाता है वहा से ही घुसखोरी शुरू होती है. और मरीज़ को डिस्चार्ज करवाने से लेकर एम्बुलेंस से घर आने तक दस बीस रुपये से लेकर हजार 5 हजार रुपये तक डरा, धमका, फुसला कर, या ख़ुशी मे ले लेते हैं.

डर भय नाम की कोई चीज़ नहीं है इन लोगों मे. ऐसी स्थिति तब उत्पन होती है जब पूरा सिस्टम करप्ट हो. वर्ना उपर वाला सब देख लेता है. मरीज़ भी सुविधा का समय पर लाभ लेने के लिए धीरे धीरे पैसा देता जाता हैं. या यह कहे डर के मारे पैसा देता जाता है. क्यों कि अगर उनसे ज़बान लडायेगा तो उसका पर्चा नीचे दब जाएगा. या टी ब्रेक और लंच हो जाएगा. इधर कुआ उधर खाई वाली हाल होती है मरीजों की.

अगर बड़े-बड़े “क्रांतिकारी” अधिकारी और सेठ या नेता जी लोग इस अस्पताल मे अगर आना शुरू कर दे तो इनके मन में डर बैठ जाएगा और ग़रीबों का पैसा बच सकता है. बुद्धिजीवी वर्ग के लोगों के आने से सरकारी सुविधा मे और उन्नति आ सकती है, हम यह नहीं कह रहे हैं कि आज कल बुद्धिजीवी लोग सरकारी अस्पताल में नहीं आते जाते है.

जी बिल्कुल आते जाते हैं और दबदबा बनाकर सरकारी कर्मचारियों से काम भी करवाते हैं. मगर क्रांतिकारी लोग कम आते हैं. ज्यादा तर लोग मेरे जैसे पैसा देकर मन बढ़ा देते हैं. और आवाज नहीं उठाते हैं.

बस जरूरत है कुछ क्रांतिकारी किस्म के सम्भ्रान्त लोगों के आने की और आवाज उठाने की. क्यों कि सरकार भी चाहती है सरकारी पैसे का दुरुपयोग ना हो. जीससे सबको समान उपचार और सम्मान मिल सके और गरीब मजदूर का पैसा बच सके.

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Prince vidyarthi

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