चिरौंजी – का पेड़ प्राय जंगल में पाए जाने के कारण इसका संग्रहण, उत्पादन एवं व्यापार केवल स्थानीय लोगों तक ही सीमित रह गया है। इस पेड़ की व्यावसायिक क्षमता को ध्यान में रखते हुए, इसको जंगलों तक सीमित न रखते हुए, इसके उत्पादन को बढ़ाने के लिए इसे बागवानी में लाना होगा। चिरौंजी की व्यावसायिक बागवानी करने से किसान लाभान्वित हो सकते हैं।
अगर करना चाहते है इस लाभकारी ड्राई फुड ( चिरौंजी) की खेती तो रखे इन बातो का ध्यान..?
1- व्यावसायिक बागवानी में लाने से चिरौंजी के उत्पादन में वृद्धि होगी, जिससे इसका निर्यात भी किया जा सकता है। किसान इसकी बागवानी करके अपनी आय में वृद्धि कर सकते हैं और जीवनस्तर सुधार सकते हैं।
2- चिरौंजी का वृक्ष मुख्यत सूखे पर्वतीय प्रदेशों के जंगलों में मिलता है। जैसे- पूर्वी-घाट, पश्चिमी घाट, ओडिशा, हिमाचल प्रदेश, मध्यप्रदेश, छोटा नागपुर, आदि। प्राकृतिक रूप से सभी क्षेत्रों में पाए जाने के कारण इसकी बागवानी की संभावनाएं लगभग सभी राज्यों में बहुत अधिक हैं।
निचे घंटी पर क्लिक कर दिजीए और allow कर के नोटीफिकेशन ऑन कर दिजीए ना..?
3- चिरौंजी एक सदाबहार वृक्ष है। इसकी ऊँचाई 15 से 25 फीट के आसपास होती है। इसकी छाल बहुत ही मोटी और खुरदरी होती है। इसकी पत्तियाँ 15-20 सें.मी.लम्बी एवं गोल आकार में जालीदार सिरे युक्त होती हैं। इसके फल 8-12 मि.मी. के,अंडाकार और गोलाकार होते हैं। इस वृक्ष केफल से प्राप्त गुठली को फोड़कर चिरौंजी निकाली जाती है।
4- चिरौंजी में प्रचुर मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है। इसके सेवन से शरीर में प्रोटीन कीकमी पूरी की जा सकती है। इसे मिठाई में, सूखे मेवे के रूप में प्रयोग किया जाता है।
5- शारीरिक कमजोरी के लिए चिरौंजी खाना बहुत फायदेमंद होता है। यह शारीरिक क्षमता का विकास भी करता है। इसे दूध के साथ पकाकर सेवन करने से सर्दी-जुकाम में फायदा होता है। इसका सौंदर्य उत्पाद में इस्तेमाल करने से चेहरे पर चमक आती है और कील-मुहांसे, दाग आदि साफ हो जाते हैं।
6- आयुर्वेद में चिरौंजी का फल मधुर, अम्ल तथा कफ-पित्तशामक माना गया है। इसका तेल पित्तविकारों में हितकारी होता है।
7- चिरौंजी के पेड़ से निकलने वाले गोंद का प्रयोग चर्म रोग की औषधि में होता है एवं पेय पदार्थ में भी इसका प्रयोग किया जाता है। बागवानी की संभावनाएं
8- चिरौंजी की बागवानी की विशेषता यह है कि जंगली पौधा होने के कारण इसे पानी की ज्यादा आवश्यकता नहीं होती तथा जानवर भी इसे नहीं खाते हैं। अनुपजाऊ तथा पथरीली जमीन पर भी इसे आसानी से उगाया जा सकता है, साथ ही साथ इसमें कीट-रोग आदि की समस्या नहीं होती। यह पेड़ अधिकांश जंगली क्षेत्रों में मिलता है, लेकिन उपयोगिता के हिसाब से इस पेड़ की बागवानी या खेती करने से कम संसाधनों में भी यह किसान को बहुत अच्छा आर्थिक लाभ ले सकता है।
9- इससे प्राप्त होने वाले उत्पादों की कीमत बाजार में बहुमूल्य है,इसकी खेती बड़े स्तर पर करने से किसान इससे लाभान्वित हो सकते हैं, साथ ही साथ छोटे किसान या जिनके पास जमीन कम है वे इस पेड़ को अपने खेत की मेड़ पर भी लगा सकते हैं। इसके फल से अपनी आय के स्रोत बढ़ा सकते हैं। यह फल किसान की आय वृद्धि करने में एक निर्णायक भूमिका अदा कर सकता है।
10- चिरौंजी के बीज को परिपक्व होने में 4-5 महीने लगते हैं। इसके फूल आने का समय फरवरी के पहले सप्ताह से तीसरे सप्ताह तक होता है। चिरौंजी के फल की तुड़ाई अप्रैल-मई में की जाती है। फल पकने के समय में इनका रंग हरे से बैंगनी में बदल जाता है। पके हुए फल मीठे और स्वादिष्ट होते हैं, जिन्हें खाया जाता है।
यह भी पढे…? भारत के जामताड़ा शहर मे आलु के भाव मे काजु 50 रुपया kg आखिर क्यो बिकता है..?
11- तुड़ाई से प्राप्त चिरौंजी फलों को एक रात के लिए साधारण पानी में भिगोया जाता है और उसके बाद ये धोकर दो-तीन दिन तक धूप में सुखाए जाते हैं। सूखी हुई गुठली से चिरौंजी दाने निकालने के लिए प्रायः पारंपरिक विधि का प्रयोग किया जाता है। इसकी गुठली को ओखली में कूटकर दाने को निकाला जाता है। उन्नत विधि के लिए आधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल किया जा सकता है..?
यह भी पढे..? कर्नाटक के विजयपुरा से देश भर मे जाता है टाॅप क्वाॅलिटी का किशमिश, फिर भी वहा के किसान गरीब और परेशान क्यो..?
आप निचे घंटी पर क्लिक कीजिए और allow कर के नोटीफिकेशन ऑन कर दिजीए ना..?







