1अरब 96 करोड़ 8 लाख 53 हजार 125 वां नववर्ष व विक्रमी संवत् 2081 का वैदिक इतिहास तथ्य प्रमाण के साथ एक बार पुनः अवश्य पढे..?

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1,96,8,53,125 वां नववर्ष व विक्रमी संवत् 2081 (9 अप्रैल 2024) का वैदिक इतिहास एक बार पुनः अवश्य पढे

यह संवत्सर संसार के सभी धार्मिक एवं पवित्र मनुष्यों के लिए उपयोगी है-

चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा का ऐतिहासिक महत्व इस प्रकार हैं।

1:- वैदिक साहित्य के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के प्रथम सूर्योदय तक परमेश्वर ने संपूर्ण सृष्टि का निर्माण कर मानवों को उत्पन्न किया था अतः इसे सृष्टि संवत्सर के साथ-साथ मानव संवत्सर भी कहते हैं

2:- इसी दिन मानव मात्र के हित कल्याण निमित्त परमात्मा ने अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा नाम के चार ऋषियों के अंतःकरण में वेद ज्ञान प्रकाशित किया इसलिए इसे वेद संवत्सर कहते है

3:- इसी दिन कलियुग संवत्सर आरंभ होता है।दुर्योधन की मृत्यु के समय योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण जी ने कहा था- *‘प्राप्तं कलियुगं विद्धि’,* अर्थात् आज से कलियुग प्रारम्भ हो गया। इस कारण यह दिन किसी भी युग का प्रारम्भिक दिन होने से युग संवत्सर भी है।

4:- प्रभु श्री राम का राज्याभिषेक चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को हुआ था। वाल्मिकीय रामायण के अनुसार वेद-वेदांग-विज्ञान के महान् ज्ञाता मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम ने आततायी महाबली रावण का वध इसी दिन किया था। ध्यातव्य है कि श्रीराम व रावण का अन्तिम युद्ध चैत्र की अमावस्या को प्रारम्भ हुआ और दो दिन चला। प्रचलित दशहरे (विजयादशमी) का रावण वध से कोई सम्बन्ध नहीं है।

5:- महाभारत के अनुसार इसी दिन धर्मराज युधिष्ठिर की अधर्म की प्रतिमूर्ति दुर्योधन पर विजय हुई थी।

6:- चक्रवर्ती सम्राट युधिष्ठिर का राज्यभिषेक भी इसी दिन हुआ था अत: युधिष्ठिर संवत्सर भी इसी दिन आरंभ होता है। यह आज से 5125 वां युधिष्ठिर संवत् प्रारंभ होता है।

7:- समस्त भारतीयों के लिए यह दिन इस कारण महनीय है क्योंकि यह सृष्टि उत्पत्ति का, मानव संवत्सर का तथा वेदों की उत्पत्ति का संवत्सर है तथा भगवान् श्रीराम, धर्मराज युधिष्ठिर, विक्रमादित्य शालिवाहन जैसे धर्म पारायण महाराजाओं के धर्म राज्य का स्थापना दिवस भी है। सम्राट् विक्रमादित्य जिनके नाम से इस दिन विक्रम संवत् का प्रारम्भ होता है । यह 2081 वां वि.सं. है। सम्राट विक्रमादित्य ने इसी दिन अपना राज्य स्थापित किया था। इन्हीं के नाम पर विक्रमी संवत् का पहला दिन प्रारम्भ होता है।

8:- विक्रमादित्य की भांति शालिवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना था इसलिये यह शक संवत्सर भी इसी दिन आरंभ होता है। यह 1946 वां शक संवत् प्रारंभ होता है

9:- 149 वर्ष पूर्व स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने इसी दिन को आर्य समाज की स्थापना दिवस के रूप में चुनाव किया ।आर्य समाज वेद प्रचार का महानतम कार्य करने वाला संगठन है।

गोपथ ब्राह्मण के अनुसार “मुखं वा एतद् संवत्सरस्य यत् फाल्गुनी पौर्णमासी”
अर्थात् फाल्गुन मास की पूर्णिमा संवत्सर का मुख है। इसी प्रकार
तैत्तिरीय ब्राह्मण के अनुसार “यदुत्तरे फल्गुनी मुखत: एवं संवत्सरस्य
अर्थात् उत्तरा फाल्गुनी संवत्सर का मुख है, *इस प्रकार पुर्णिमान्त मास मानने वालों की गणित के अनुसार चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को नव वर्ष का आरम्भ माना जाता है जब कि अमान्त (अर्थात् कृष्ण पक्ष का अन्त) मास मानने वालों का चैत्र शुक्ला प्रतिपदा को ही नव वर्ष आरम्भ होता है क्योंकि चैत्र शुक्ल प्रकाश का द्योतक होने से चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही प्राय: नव संवत्सर का आरम्भ माना जाता है।।

“हिमाद्रि” ज्योतिष शास्त्र का प्रसिद्ध ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में एक श्लोक आता है

चैत्रे मासि जगद् ब्रह्मा ससर्ज प्रथमेऽहनि।
शुक्लपक्षे समग्रन्तु, तदा सूर्योदये सति।।

इसका अर्थ है कि चैत्र शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन सूर्योदय के समय ब्रह्मा ने जगत की रचना की। प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य भास्कराचार्य रचित ‘‘सिद्धान्त शिरोमणि” का एक श्लोक है।
लंकानगर्यामुदयाच्च भानोस्तस्यैव वारं प्रथमं बभूव।मधो:सितादेर्दिनमासवर्षयुगादिकानां युगपत्प्रवृत्तिः।।

इसका भावार्थ है कि लंका नगरी में सूर्य के उदय होने पर उसी सूर्य के वार अर्थात् आदित्यवार को चैत्र मास, शुक्ल पक्ष के आरम्भ में दिन, मास, वर्ष व युग आदि (अर्थात् सृष्टि संवत्सर) एक साथ आरम्भ हुए।

वैदिक नववर्ष का प्राकृतिक महत्व

1- वसंत ऋतु का आरंभ नये वर्ष की प्रतिपदा से ही होता है जो उल्लास, उमंग, खुशी तथा चारों तरफ पुष्पों की सुगंधि से भरी होती है।
2- भारत सरकार और व्यापारिक समुदाय के नये वर्ष शुभारम्भ का समय लगभग यही हैं।

यह संवत्सर मनुष्य की उत्पत्ति, सृष्टि की उत्पत्ति, और वेद ज्ञान की उत्पत्ति के साथ-साथ भगवान श्रीराम ,सम्राट् युधिष्ठिर , सम्राट् विक्रमादित्य आदि के राज्याभिषेक का पर्व है । इस लिए प्रत्येक भारतवासी का परमकर्तव्य यह हैं कि इस पर्व को अपने जन्मदिन की तरह मनाए और इस संस्कृति एवं राष्ट्र की उन्नति तथा प्रगति में अपने सामर्थ्य के अनुसार योगदान देने के लिए तत्पर और संकल्पबद्ध रहें।

लेेखक- ओमप्रकाश शास्त्री

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