डार्विन का सिद्धान्त :—पागलपन खोज
▶️ एक डार्विन था, जिसने घर मे बैठे बैठे एक गपोड़ सिद्धांत दिया कि मनुष्य का विकास बंदरो से हुआ। यानी बंदर ही विकसित होते हुए मनुष्य बन गए।
इस अवैज्ञानिक सफेद झूठ को हमारे उल्टी बुद्धि के नेता, सरकार ने स्वीकार करके स्कूलों में पढ़ाना भी शुरू कर दिया। उससे बड़े बुद्धि के पैदल जनता ने इसे सच स्वीकार भी कर लिया।
संसार का सबसे प्राचीन वेद ग्रंथ है जो मनुष्य सृष्टि उत्पत्ति के समय ईश्वर द्वारा दिया ज्ञान है,जिसमें सभी मनुष्य के लिए ज्ञान, आचरण का संदेश दिया गया है। अर्थात वेद जिस समय मनुष्य के माध्यम से घरती पर आया ,उस समय मनुष्य पूर्ण विकसित अवस्था मे था। वेद के अवतरित होने का काल करोड़ वर्ष पुराना है। जिसे लिपिबद्ध बाद के लाखों वर्षो बाद किया गया।हमारे पूर्वज ऋषि मुनि थे हम सब सभ्य विद्वान विकसित मनुष्य जाति के रूप में ईश्वर द्वारा जैसे थे वैसे ही किसी प्रकार के विशेष शारीरिक बदलाव के आज तक वजूद में हैं।
इसके अलावा संसार का ऐसा कोई अन्य प्राचीन ग्रंथ या पुस्तक भी नही है जिसमे बंदर को मनुष्य बनते देखे जाने के बारे कुछ लिखा पाया गया हो। विज्ञान के अनुसार और सृष्टि विधान के अनुसार बंदर और मनुष्य में शारीरिक सरंचना , कद, वाणी में भारी अंतर है। अगर बंदर जानवर योनि से मनुष्य योनि में बदला है तो सभी बंदर बदल जाने चाहिए थे, सब क्यों नही बदले ? आज लाखों – करोड़ों बंदर कैसे बंदर ही बने रह गए ? इन बंदरो का विकास क्रम कैसे रुक गया ? बंदरो का विकास होकर मनुष्य अस्तित्व में आया है तो सभी बंदर मनुष्य बनने चाहिये थे। सब बंदर बंदर ही क्यों बने रह गए ?
ऐसा कोई उदाहरण विश्व मे देखने मे नही आया कि एक जाति का जीव, दूसरी जाति के जीव का रूप ग्रहण कर लिया हो। उदाहरण के लिए समझाता हूँ जैसे अनेक पक्षी , पशु की जातियाँ हैं कौआ, चील, गिद्ध, बाज, तोता, कबूतर, गाय, भैंस, घोड़ा हैं। ये लाखों- करोड़ो वर्षों में अन्य नस्ल जाति के पक्षी या पशु के रूप में परिवर्तित नही हुए। जो थे आज भी वही हैं। फिर अकेला बंदर ही कैसे अपनी बंदर जाति बदल कर मनुष्य जाति में बदल सकता है ? क्या परमेश्वर सीधे मनुष्य बनाने में सक्षम नही था ? जबकि इतनी वैज्ञानिक अद्भुत और सुन्दर सृष्टि की रचना उसने मनुष्यों के उपयोग के लिए की हो।
डार्विन के पास कोई ठोस साक्ष्य भी नही थे फिर भी बंदर से मनुष्य बनने का गलत सिद्धांत थोप दिया। सृष्टि ने किसी भी जीव को विकसित करके दूसरे जीव में नही बदला है। सभी जीवों में अलग अलग रक्त संरचनाएं होती हैं उनके अलग अलग DNA होते हैं। इसी कारण सब जीवों- प्राणियों का रूप रंग, आकार एक दूसरे से भिन्न होता है। अतः ये संभव ही नही कोई जीव स्वतः ही अपना ही रूप रंग, आकार DNA रक्त संरचनाएं बदलकर दूसरा रूप, रंग, आकार प्राप्त कर सके।
इसलिए डार्विन का सिद्धांत केवल मूर्खो के लिए बना है।
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