शास्त्रो का यह एक शब्द “अपरिग्रह” आपको मालामाल कर सकता है, बस समझने की देरी है..?
अपरिग्रह: वैसे तो कई ग्रंथो मे इस शब्द का उल्लेख किया गया है, परन्तु हम महर्षी पतंजली ने योग दर्शन मे अपरिग्रह का जो उल्लेख योग के आठ अंगो मे पहला अंग जो “यम” है, इसी के अन्दर “अपरिग्रह” का भी उल्लेख किया गया है, उसका ही वर्णन हम आज यहा करेंगे..?
आज हर घर परिवार मे अधिकांश लोग अपरिग्रह शब्द का उल्लंघन करते है , और जाने अनजाने मे पाप और दुःख के स्वतः भागीदार बनते है,
अपरिग्रह का अर्थ है , किसी पदार्थ को आवश्कता से अधिक संचय करना यानी की इकट्ठा करना, जैसे- बिना मतलब की बातो को अपने मन- बुद्धी मे रखना, अनावश्यक बातो मे समय उर्जा नष्ट करना और उसके बारे मे सोच सोच कर दुःख को प्राप्त होना, तनाव से ग्रसित होना, यह सब अपरिग्रह के अन्तर्गत आता है
दुसरा है की आवश्यकता से अधिक संसाधन को इकठ्ठा करके अपना व्यर्थ समय और बल बुद्धी उर्जा और “पैसा” को नष्ट-भ्रष्ट करना, अगर आपकी एक गाड़ी से काम चल जाये तो अधिक गाड़ी क्यो रखना, अगर नया गाड़ी-वाहन ले तो पुराना बेच दे, इसी तरह घर, कपडा, जुता-चप्पल, मोबाइल, भोजन सामग्री इत्यादी चीजे जितना से आपका काम चल जाए उतना ही रखे , अधिक को बेच दे अथवा दान कर दे,
नही तो इन सब वस्तुओ को संभालने मे आपका व्यर्थ समय, पैसा और उर्जा नष्ट होगा इस कारण आप दिन रात हैरान परेशान रहेगें, इसलिए ऋषि कहते है इन सभी प्रकार के हानिकारक कार्यो से दूरी बनाकर रहने का प्रयास करे
मान लीजिए आपके पास दो तीन जोड़ी जुता-चप्पल है , और आपके पड़ोस मे कोई गरीब नंगे पैर चल रहा है उसे कंकड पत्थर काटे चुभ रहे है, तो उसकी आह और पाप आपको भी लगेगी, चाहे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ही क्यो ना पाप लगे, इसी तरह भोजन का भी ले लिजिए, अगर आपको या आपके शरीर को जितना जरूरत है उतना ही खायेंगे-पहनेंगे तो उस बस्तु का रेट भी कम रहेगा और समाज के अंतिम पायदान पर रह रहे व्यक्ति को भी उसका लाभ मिल सकेगा
इस प्रक्रिया को समझकर और अपना कर ही अपरिग्रह करने से बच सकते है, और आप लाखो रुपए का बचत करने के साथ-साथ बिन्दास जिवन जी सकते है, और उस बचे हुए समय और रुपए से दान-दया, योग-ध्यान भी कर सकते है,
इसी प्रकार से ही तो अपरिग्रह शब्द को समझ कर टाटा, बिरला, अडानी, अम्बानी इत्यादी बड़े व विद्वान लोग सरल और खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे है.
आप साधु-संत को ही देख लिजिए संत महात्मा लोग सबसे पहले “अपरिग्रह” को ही छोड़ते है, और एक लंगोट मे ही पुरा जीवन इश्वरीय आज्ञानुसार खुशहाल जीवन यापन करते रहते है
वैसे तो अपरिग्रह शब्द का अनेक विद्वानो ने अनेक अर्थ बताये है, जैन दर्शन मे तो “अपरिग्रह” धर्म के लक्षणो मे से एक लक्षण ही है,
अगर आप दुसरे के धन-वस्तु को देखकर उस पर बुरी द्रष्टि रखते है, दुसरे के हक को अपना बनाने का प्रयास करते है, या छिनना, लुटना, चोरी इत्यादी कार्य “अपरिग्रह” के अन्तर्गत ही तो आते है..? अगर आप और आप का पुरा घर-परिवार इस एक शब्द “अपरिग्रह” को समझ कर बिना जरुरत की वस्तुओ को खरीदना और पाने की कामना करना छोड दे तो देखेंगे कुछ दिनो बाद आपके घर मे धन (पैसा) ठहरने लगा है, और आप सन्तुष्ट भी है
अतः कुल मिलाकर अगर “अपरिग्रह” करना छोड़ देते है तो अनेक दुःखो से छुट कर ढेर सारे धन का बचत कर सकते है. फिर धीरे-धीरे दान दया धर्म कर्म मे आपका अधीक मन लगने लगेगा, और फिर आपका मुख्य केंद्र शरीर नही आत्मा हो जायेगी, अगर आत्मा आपका सुख-दुःख का केंद्र हो गया तो समझे बस आपका वैराग्य और मोक्ष पाने का रास्ता साफ हो रही है.?
प्रस्तुत कर्ता:- प्रिन्स विद्यार्थी (भारत की लगाम न्युज)
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