राजीव दीक्षित और मैं : मेरे जीवन को नई दिशा देने का श्रेय श्री राजीव भाई दीक्षित को जाता है: आचार्य प्रशांत

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३० नवंबर की वह रात… #राजीव_दीक्षित जी और मैं ????

गांव में आर्य समाज का कार्यक्रम हो रहा है समय है फरवरी २०११ , जो भी वक्ता मंच पर आ रहा है वह चिल्ला चिल्ला कर कह रहा है सत्यार्थ प्रकाश पढ़ो सत्यार्थ प्रकाश पढ़ो तो मैं सोच रहा हूं कि इतनी पुस्तक पढी हैं है तो चलो इनके कहने से एक सत्यार्थ प्रकाश पढ़ लेते हैं इसमें ऐसा है क्या जो इतना जोर दे रहे हैं इसके लिए। फिर मैं अपने गांव के किसी व्यक्ति से सत्यार्थ प्रकाश लेता हूं और उसे पढ़ रहा हूं। पूरा पढ़ने के पश्चात् राष्ट्र और धर्म क्या है मुझे कुछ कुछ समझ आ रहा है मैं फिर अपनों से टेढ़ी मेढी बात करने लगा हूं (घर वालों के अनुसार) जो कि सीधी हैं। मैं हर बात का अलग ढंग से जवाब देता हूं मेरी मां कहती है कि यह जो लाल पुस्तक (सत्यार्थ प्रकाश) है इसे पढ़ने के बाद ही इसके दिमाग में कुछ हुआ है।

यह सब चलता रहता है पड़ोसी की टीवी में एक दिन स्वामी रामदेव को देखता हूं और पाता हूं कि यह बाबाजी तो देश धर्म की बातें सत्यार्थ प्रकाश में से ही कर रहे हैं इसलिए मैं उनसे प्राभावित होकर प्रतिदिन उनको सुनता हूं और साथ ही योगासन प्राणायाम करना सीख गया हूं भजन भी चिल्ला चिल्लाकर गाने लगा हूं।

“भगवान आर्यों को ऐसी लगन लगा दे” 

“आज जरूर भारत मां को ऐसे वीर जवानों की” 

मां मुस्कुराते हुए कहती हैं कि प्रशान्त पागल हो गया है दिन भर आर्यों के गीत गाता है । भारत में स्वामी रामदेव स्वदेशी, एवं योग की क्रान्ति कर रहे हैं, यह स्वामी रामदेव का २०१२ का स्वर्णिम काल चल रहा है।

 

३० नवम्बर की रात्रि ८ बजे मैंने देखा कि स्वामी रामदेव के साथ मंच पर एक व्यक्ति पायजामा कुर्ता पहने हुए भाषण दे रहा है विषय है “भारत की दुनिया को देन” यह देख कर सबसे पहले यही लगा कि आज तो बाबा जी किसी नेता को पकड़ कर ले आए लेकिन मैं जब उनको यह कहते हुए सुना कि भारत का व्यापार पूरी दुनिया में सबसे अधिक था भारत के शिक्षा व्यवस्था ऐसी थी भारत की चिकित्सा व्यवस्था ऐसी थी भारत इतना उन्नत था भारत की संस्कृति ऐसी थी सभ्यता ऐसी थी ऐसी ऐसी बातें जब मैंने सुनी तो मुझे लगा कि यह व्यक्ति कोई नेता तो हो नहीं सकता क्योंकि नेता तो ऐसी बात करते हैं कि हमने इतने श्मशान इतनी सड़कें बनवाई हमने इतने अस्पताल बनवाए देश के इतिहास, व्यापार, चिकित्सा, स्वदेशी, आयुर्वेद संस्कृति की इतनी प्रमाण के साथ कोई व्यक्ति बात कर रहा है यह कोई भी हो परन्तु नेता तो हो नहीं सकता लेकिन यह कौन है मुझे नहीं पता मैंने उनके हाथों में कई सारे दस्तावेज देखे जिसे देखकर वे बात कर रहे थे मेरा बहुत जोर से मन किया कि इसे मुझे अपने जीवन में इस व्यक्ति से एक बार जरूर मिलना है और इनसे यह दस्तावेज लेकर यही बातें पूरे भारत में पहुंचानी हैं।

 

परन्तु मुझे अभी तक इनका नाम नहीं पता है तो मुझे लगा कि पता नहीं ये व्यक्ति कब आता है चैनल पर रोज ध्यान देना पड़ेगा इसे तो सुनना पड़ेगा तो सोचा स्वयं की टीवी खरीदकर लाता हूं इसलिए घर पर ही सुनेंगे क्योंकि दूसरे लोग चैनल बदल देते हैं कभी कोई सीरियल देखते हैं या कभी मूवी और इतने में मेरा दम निकल जाता है लगता है कि बहुत कुछ छूट रहा है।

 

पिताजी ने उसी समय कर्जा मुक्ति के लिए अपना पैतृक खेता बेचा था इसी रकम में से मैं १०००० रुपए लिए (पिताजी से पहली और अंतिम बार कुछ मांगा था अपने लिए) और घर में टीवी लेकर आया उसी समय महाभारत भी आता था तो एक भी एपिसोड बिना छोड़े वह भी मैं प्रतिदिन देखता था।

 

मैं व्यग्रता से प्रतीक्षा कर रहा हूं कि वह पायजामा कुर्ता वाला व्यक्ति अब दोबारा टीवी पर कब आएगा और मुझे कैसे पता चलेगा कि वह कहां रहता है मैं उसे कैसे मिल सकता हूं मेरे मन में बहुत सारे प्रश्न है ?

 

एक दिन बाजार की गली से गुजरते हुए एक पतंजलि स्टोर पर मेरा ध्यान जाता है और उसी दुकान में रखे काउंटर पर एक फ्लेक्स बैनर लटका हुआ होता है जिस पर उस पजामा कुर्ते वाले व्यक्ति का फोटो दिखाई देता है और उसके नीचे उसका नाम लिखा होता है राजीव दीक्षित (भारत स्वाभिमान)

 

मुझे उनका नाम मिल जाता है, अब यह राजीव दीक्षित कौन है इसके विषय में जानने के लिए मेरे पास बस एक ही साधन है वह है मेरा माइक्रोमैक्स का कीपैड मोबाइल जिसमें मैंने शायद ही पहले कभी इंटरनेट का उपयोग किया था।

 

२जी इंटरनेट पर मैंने गूगल से पूछा कि राजीव दीक्षित कौन है। रात्रि का समय है भयंकर ठंड है मैं रजाई में लेटा हुआ हूं, बफरिंग हो रही है धीरे-धीरे धुंधले अक्षर स्पष्ट हो रहे हैं और मेरे मन में कल्पना चल रही है कि आज मेरा हीरो मुझे मिल गया और अब मैं अपने हीरो से मिल पाऊंगा और तभी पूरा पृष्ठ खुलता है गूगल मेरे प्रश्न का उत्तर देता है उसमें राजीव भाई के चित्र के नीचे नाम आता है जिसमें लिखा है

“स्वर्गीय श्री राजीव दीक्षित” स्वर्गीय पढ़कर मुझे ऐसा झटका शायद ही आज तक किसी की मृत्यु का लगा होगा। मैं सोच रहा हूं इतनी जवानी में कोई कैसे मर सकता है क्या इनसे किसी को खतरा था किसी ने कहीं मरवा तो नहीं दिया यह सब मेरे विचार चल रहे हैं ।कड़ाके की ठंड में मेरा पसीना बहने लगा हृदयगति बढ़ गई मुझे लगा कि मेरा सपना पूरा होने से पहले ही टूट गया फिर मैं उनकी मृत्यु का कारण जानने के लिए नीचे तेजी से स्क्रॉल कर रहा हूं।

 

और फिर देखा रामदेव ही उनकी मृत्यु का कारण उस लेख में दिख रहे हैं मेरा तो दिमाग सुन्न हो गया कि यह सब कैसे हो सकता है उस समय रामदेव के प्रति मेरी श्रद्धा ऐसे ही गिरी जैसे इस्राइल की मिसाइल से गाजा की इमारतें भरभराकर गिरती हैं। मैं रोता रहा और रोते रोते कब नींद आई याद नहीं…।

 

फिर मुझे सुबह उसी पृष्ठ पर राजीव दीक्षित जी के ऑडियो मिलते हैं मैं उनको डाउनलोड करके सुनना लगा और मुझे उनका नशा होता गया । इंटरनेट की स्पीड २जी में आती थी मैं जब तक भैंस का चारा काटता था तब तक नीम के पेड़ पर मोबाइल किसी टहनी के सहारे रख देता था एक दो घंटे में एक ऑडियो डाउनलोड हो पाता था जिसे मैं रात को सुन लेता था दूसरे दिन फिर यही करता था और उस समय उनके MP3 में मात्र १५५ व्याख्यान ही उपलब्ध हुआ करते थे।

 

मैं धीरे-धीरे उनको सुनता जा रहा हूं और देश की परिस्थितियों को समझ रहा हूं और तनाव बढ़ता जा रहा है। रातों की नींद दिन का चैन खोता जा रहा है दिन भर इयर फोन लगाकर उन्हीं को सुनता रहता हूं। खेलना कूदना दोस्तों के साथ मिलना घरवालों से बात करना सब बंद हो गया है इंटरनेट की कमी होने के कारण बड़े भाई को दिल्ली फोन करके उनसे कई सारे ऑडियो डाउनलोड करके लाने को कहा फिर वह डाउनलोड करके ले आए तो सारा डाटा अपने मोबाइल में ट्रांसफर करके पूरे के पूरे व्याख्यान मेरे मोबाइल में आ गए। मुझे लग रहा है कि मेरा खजाना आज मेरे क़ब्ज़े में आ चुका है।

 

सर्दियों का समय है और मैंने पीठ पर कीटनाशक छिड़काव की मशीन टांगी हुई है स्प्रे पाइप हाथ में ले रखा है गेहूं में छिड़काव कर रहा हूं जेब में मोबाइल और कान में ईयरफोन है उस दिन का व्याख्यान गुरुकुलों के स्वर्णिम युग के विषय में हैं जिसका शीर्षक है ” आजादी के बाद भी चल रहा है लार्ड मैकाॅले का एज्युकेशन सिस्टम” जिसका समय १७२ मिनट है ।

 

मेरा शरीर गेहूं पर खरपतवार नाशक का छिड़काव कर रहा है। और साथ ही राजीव भाई मेरे मन पर अपने विचारों का छिड़काव कर रहे हैं। अंततः छिड़काव पूरा हुआ, खेत के खरपतवार का मैंने काम तमाम किया और साथ ही राजीव भाई ने मेरे अंदर के खरपतवार का काम तमाम कर दिया, मेरे सभी संदेह मिट ग‌ए वह व्याख्यान मेरे लिए “जीवन परिवर्तक” सिद्ध हुआ। अंतत: निश्चित हो गया कि अब गुरुकुल जाना ही है चाहे जो भी हो।

 

मैंने व्याख्यान समाप्त होते ही गुरुकुल में प्रवेश हेतु भारत स्वाभिमान के कार्यालय में पतंजलि योगपीठ हरिद्वार फोन किया कुछ बात होने के बाद उन्होंने कहा कि क्षमा कीजिए हम आपको प्रवेश नहीं दे सकते क्योंकि आप गृहस्थ हैं। हमारे यहां ब्रह्मचारियों को ही प्रवेश दिया जाता है।

 

मैं बहुत निराश हो गया अब मेरे पास मेरी जानकारी में कोई दूसरा गुरुकुल भी नहीं है मेरे गांव में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो किसी भी गुरुकुल के विषय में कुछ भी जानता हो। अब मैं एक गुरुकुल की खोज में भटक रहा था पर मुझे कहीं से कोई संपर्क नहीं मिला। अभी तक मुझे यह बिल्कुल पता नहीं है कि बाबा रामदेव के अतिरिक्त भी देश में गुरुकुल चलते हैं।

 

मैं राजीव भाई को ही सुनता रहा सुन सुन करके मुझे उनके सारे व्याख्यान याद हो गए जिसमें वह सारे आंकड़े बोलते हैं अंग्रेजों के नाम लेते हैं भारतीय राजनेताओं के नाम लेते हैं लगभग मुझे उनके सारे व्याख्यान याद हो गए थे। रात को भी मैं सोता नहीं था इसीलिए मैं रात को भी वही सुनता रहता था तनाव का शिकार होता जा रहा था शरीर बहुत कमजोर हो गया खाना खाते ही उल्टियां आती थीं, चक्कर आते थे । बीपी बढ़ता रहता था लगता था कि अब हृदयाघात होगा।

 

अभी तक मेरे अंदर क्या चल रहा है यह घर वालों को पता ही नहीं है।

मां कहती है कि इतना कमजोर हो रहा है शरीर काला पड़ गया है खाते ही उल्टियां हो रही है क्या चक्कर है ? डॉक्टर को दिखाओ लेकिन मुझे पता था कि मेरे रोग की चिकित्सा किसी भी डॉक्टर के पास नहीं है इसीलिए मैंने किसी भी चिकित्सक को कोई संपर्क नहीं किया। मां कहती थी कि आखिर तेरी समस्या क्या है ऐसी स्थिति क्यों हो रही है तेरी ?

 

अब मैं मां को कैसे समझाऊं कि क्या समस्या है ? कैसे बताऊं कि देश लुट रहा है और मैं कुछ नहीं कर पा रहा हूं। शायद इस पर वो हंसती या आप भी हंसोंगे कि ऐसा किसके साथ होता है भाई ? परन्तु यह मेरे साथ हुआ था और मैंने किसी को कुछ नहीं बताया आज तक कि मैं अंदर में मर रहा हूं ।

 

अभी यह स्थिति बन गई है कि जब भी किसी नेता को देख रहा हूं तो उसमें लार्ड डलहौजी, ए च व्हीलर, नील दिख रहा है। किसी के हाथ में कोल्ड ड्रिंक देख रहा हूं कोलगेट देख रहा हूं तो मुझे लग रहा है कि देश की सबसे बड़ी बर्बादी का कारण यही लोग हैं। यह सब दिन भर चलता है। लोगों को समझाता हूं पर कोई मानता नहीं है।

 

मुझे लगने लगा कि अब गुरुकुल जाने से रहा और यहां मैं ऐसे जीने से रहा और मुझे लगता है कि मैं अब देश के लिए कुछ कर भी नहीं पाऊंगा इसलिए अपनी जीवन लीला को समाप्त कर देते हैं। नींद आती ही नहीं है मैं परेशान हो गया स्वयं से, इसलिए क‌ई बार रात को उठकर सोचता हूं चलते हैं किसी ट्रेन के सामने और सब समाप्त कर देते हैं। परन्तु घर में पूरे परिवार को सोता हुआ देखता हूं उनको लेकर विचार करता हूं तो मोहपाश से बंध जाता हूं इसलिए आत्मह*** का विचार त्याग देता हूं सोचता हूं कि कल देखेंगे, आज और देखते हैं शायद नींद आ जाए या कुछ मार्ग दिख जाए। अब मेरे पास दो ही विकल्प हैं या तो राष्ट्रसेवा या फिर सब कुछ समाप्त इसके अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है आंखों के सामने…

 

ऐसे ऐसे समय बीतता जा रहा है एक दिन किसी ने बताया कि वृन्दावन में एक गुरुकुल है पर वो कैसा है क्या है उसका संपर्क सूत्र क्या है वहां क्या पढ़ाते हैं किसे पढ़ाते हैं यह मुझे कोई जानकारी नहीं है पर एक गुरुकुल है वृंदावन में इतना पता है। तो मैंने कहा ठीक है फिर वहीं जाकर देखता हूं।

 

पिताजी से गुरुकुल के विषय में कहने को साहस नहीं हो रहा है मां को ही पूछ लिया कि मैं दो वर्ष के लिए गुरुकुल जाना चाहता हूं कृपया मुझे अनुमति दीजिए।

 

मां ने फटकार लगाई कि अपनी पत्नी बच्चे को संभाल और यहीं कुछ कर, अब तेरे गुरुकुल जाने का समय नहीं है। मैंने उनसे रोकर बहुत विनती की क्योंकि मुझे कैसे भी करके स्वयं को बचाना है यदि गुरुकुल नहीं गया तो न चाहते हुए श्मशान जाना पड़ेगा यह स्थिति थी।

 

मां ने कहा कि ठीक है दो वर्ष में लौट आना मुझे स्वीकार है पर अपने पिताजी से पूछ लेना एक बार… पिताजी का उत्तर मुझे पता था कि वो कभी नहीं जाने देंगे ऊपर से भड़केंगे वह अलग है।

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मैंने तय कर लिया कि चलो चलते हैं मां का आशीर्वाद ही बहुत है। लेकिन कब जाऊं कब जाऊं यह चल रहा है। एक दिन सुबह सुबह चंद्रमोहन शर्मा की आवाज में भजन चल रहा है “फिर मत कहना कुछ कर न सके” इन शब्दों ने मेरे अंदर प्राण भर दिए मैंने घर जाकर बैग धोकर सुखाने रख दिया अगले दिन जाने के लिए।

 

अगले दिन पिताजी घर से बाहर ग‌ए हैं यही अवसर है भागने का मैंने अवसर का लाभ उठाया और मैं घर से निकल लिया रास्ते मैं पिताजी दिख ग‌ए मैंने उनसे किनारा काट लिया बैग से मुंह छिपाकर निकल गया , उनको घर जाकर पता लगा होगा तब तक मेरी ट्रेन अपने गंतव्य पर निकल चुकी थी‌।

 

जब गुरुकुल में रहने लगा तो मुझे जीवनीय आशा की किरण दिखी कि हाँ! मैं अब कुछ कर सकता हूं। मेरा तनाव एक सप्ताह में दूर हो गया नींद भी आने लगी सब ठीक-ठाक हो गया अब न‌ए जीवन की नई समस्या थीं। उस पर पहले ही लिखा था मैंने “वीर सावरकर और मैं” नामक लेख को जिसका नीचे टिप्पणी में लिंक दे रहा हूं आप उसे देख पढ़ सकते हैं।

वीर सावरकर और मैं..?.. https://www.facebook.com/share/p/15TPWpZcDP/

 

इतना लम्बा इसलिए नहीं लिखा है कि आप जानें कि मैं कौन हूं। मुझे जानना कोई महत्वपूर्ण विषय नहीं है किसी के लिए, यह इसलिए लिखा है कि आप यह जानें कि एक भारतीय युवक के लिए श्री राजीव दीक्षित जी कितने महत्वपूर्ण हैं उनका समाज पर‌ क्या प्रभाव है । उनका इस अंधे समाज पर के लिए क्या योगदान हैं।

 

मेरे जीवन को एक नई दिशा देने का मुख्य श्रेय किसी को जाता है तो वह मेरे गुरु राजीव भाई हैं। जिनमें मैं २१ वीं सदी के एक क्रान्तिकारी के दर्शन करता हूं।

जब भी वे बोलते हैं तो मुझे ऐसा लगता है कि चंद्रशेखर आजाद के ही प्रतिनिधि ही मुझे जगा रहे हैं।

 

वो ३० नवम्बर की रात जब मुझे राजीव भाई के दर्शन टीवी पर पहली बार हुए उसे मैं कभी नहीं भुला सकता, कोई आया जो मुझे अंदर तक हिलाकर रख गया और मेरे जैसे अन्य हजारों लाखों युवाओं को भी । आज ३० नवम्बर है आज उनकी बहुत याद आई तो बस लिख दिया…

 

यह सब किसी को भी नहीं पता है मेरे घर पर भी नहीं, आज १३ वर्षों के बाद पहली बार लिख रहा हूं।

 

हालांकि दर्शन पढ़ने के बाद और बीतते समय के साथ जीवन में अभी बहुत कुछ बदल चुका है। वह २०१२ का दौर था आज २०२४ का दौर है।

 

आपने धैर्य पूर्वक यहां तक पढ़ा उसके लिए धन्यवाद। 

राजीव भाई अमर रहें..हमारे हृदय

Acharya prashant

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