आज 6 मई, कोल्हापुर नरेश छत्रपति शाहूजी महाराज के निर्वाण दिवस पर विशेष रूप से प्रकाशित, उनके भाषण का कुछ अंश

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आर्य धर्म विश्वव्यापी धर्म बनेगा।

राजर्षि शाहू महाराज का ऐतिहासिक भाषण-

आज 6 मई, कोल्हापुर नरेश छत्रपति शाहूजी महाराज के निर्वाण दिवस पर विशेष रूप से प्रकाशित

संपादक- #डॉ_विवेक_आर्य, प्रियांशु सेठ

दि० 8 मार्च 1920 को सौराष्ट्र के भावनगर में अखिल भारतीय आर्यसभा (आर्यसमाज) की परिषद हुई। इस सभा के प्रमुख अतिथि राजर्षि शाहू महाराज ने भाषण किया।

महाराज ने भाषण में स्वामी दयानंद जी के जीवन के कार्यो को बताकर उन्होंने कहा– वैदिक धर्म ही देश को जागृत कर सकता है, ऐसा विश्वास प्रकट किया। इस कारण वैदिक धर्म को अधिक महत्व है। इस वैदिक धर्म का मैंने स्वीकार किया ऐसे उन्होंने जाहिर किया था। स्वामी दयानंद जी का बताया हुआ यह धर्म विश्वव्यापी बनेगा ऐसा आशीर्वाद उन्होंने प्रकट किया।

बोले- सज्जनो..?

हम थोड़ा भारतवर्ष के इतिहास पर नजर डालते हैं। हजार वर्ष पूर्व के भारतवर्ष और आज के भारतवर्ष में जमीन और आसमान का अंतर है। आज पराक्रम, ज्ञान, धर्मशिलता, उदारता सद्गुण लुप्त हो गये हैं। हजारों कुसंस्कार और रूढी परंपराओं से भरा हुवा भारतवर्ष देखकर आश्चर्य नहीं होता। बालविवाह, बहुविवाह, मद्यपान, स्त्रियों को शिक्षा पर पाबंदी, वर्णश्रम धर्म कि अव्यवस्था ऐसे अनेक समाज को घातक रूढीयों से निर्जिव सा बना दिया है।

उदाहरण – वर्णव्यवस्था का ले लिजिए। सम्पूर्ण भारत में विशेष रुप से महाराष्ट्र के दक्षिण प्रांत में ब्राह्मणोत्तर जातियों की अवस्था बहुत विकट है। इन जातियों को आगे बढ़ाने के लिये, अपनी प्रगती करने के लिये कोई अवसर ही नहीं दिया जाता है। आज 20 वीं सदी में भी अस्पृश्य में जीवन जीनेवाले लोग हैं। इन लोगों का अपराध इतना ही है कि उनका जन्म एक विशिष्ट जाति में नही हुआ। आज भारतवर्ष में एकता, प्रेम, सत्कार कहीं भी देखने को नहीं मिलता है। इनका कारण हमारी स्वयं की मूर्खता है।

भारतवर्ष में ही ऐसे मनुष्य है, अपने ही बंधू का अपने शरीर पर छाया भी पड़ने नहीं देते। स्वयं को श्रेष्ठ मानने वाले व्यक्ति जाति के नशे में चूर है, और नीच मानव वाले जाति (पिछड़ा समाज) पर अन्याय-अत्याचार करते हैं।

फिर उन्होंन दयानंद जी का तारीफ करत हुए कहा की—

दयानंद जी के केवल दस वर्ष के कार्यों से ही पंजाब, संयुक्त प्रांत, राजपुत, बंगाल, बिहार जागृत हो चुके। लाखों लोग उनके अनुयायी (शिष्य) बने। उत्तर भारत वर्ष में ही नहीं तो सम्पूर्ण भारत खंड में अवैदिकीय पाठ को बदल वैदिक पाठ शुरु किया। जैसे-

ब्राह्मचर्चेण कन्या युवानं विदते पतिम्।

शुद्रों ब्राह्मणतमिति ब्राह्मणों यति शुद्रनाम्।

आर्य समाज का कार्य पूरे विश्व में विदित है। भेद भाव के बंधन तोड़कर आर्य समाज ने युद्ध में भी बहुत मदद की है। परदेश गमन मनुष्य को अपवित्र समझा जाता था, वही आज गौरव-अभिमान की बात समझी जाती है। आर्य धर्म पूर्णत: मानव समाज के हित के लिये है। खुशी की बात तो यह है कि, बहुत ही युरोपियन स्त्री पुरूषों ने इस आर्य धर्म का स्वीकार किया है और कर रहे हैं। सच कहा जाए तो लॉर्ड किचनेर, सर हेग, लॉर्ड फ्रेंच प्रभूति की गिनती पहले से ही आर्य समाज में ही हो सकती है। क्योंकि इन योद्धाओं ने क्षत्रिय धर्म का ही पालन किया है।

मेरे विचार से यही धर्मशासित शाला में प्रेम रुझाने से एकता निर्माण करने का प्रयत्न कर रहा है। मुझे पूरा भरोसा है कि, इस धर्म के अनुयायी प्रतापसिंह और सज्जनसिंह जैसे नरेश है और थे, यह हमारे लिए अभिमान-गर्व की बात है। हमें भी इसी बात का अनुकरण करना चाहिए।

यह भी बड़ी संतोष की बात है कि, आज भी अगर स्वार्थी लोग इधर उधर हाथ पाँव पटक रहे हैं, तथापि सच्चे ब्राह्मण और शिक्षित जनता ये सभी हमें अनुकूल है। परंतु, दक्षिण प्रांत में आज भी बहुत से कर्तव्य करना बाकी है। आर्यों का यह कर्तव्य है कि, इस देश में मातृभाव जागृत करना चाहिए।

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अगर सत्यशोधक समाज जैसे समाजों ने कुछ सुधार किया है, तथापि इस संस्था के कारण विशेष रूप से बहुत कुछ हो नहीं सकता, क्योंकि, शतं प्रति भाठ्यं। इस तत्व पर ही चली आ रही है। परंतु, देश को जागृत करने के लिये रामबाण मात्रा वैदिक धर्म ही है। क्योंकि, हिन्दूमात्र के अंतःकरण में वेदाभिमान विराजमान है और आर्य समाज वेदानुकुल रहने में ही हमारा धर्म समझ जाता है। आर्यसमाज का धर्म सारे विश्व पर (उपकार) एहसान करनेवाला धर्म है।

सज्जनो! वैदिक धर्म का महत्त्व अन्य विचारों से अधिक है, यह सोचकर ही मैंने इस धर्म का स्वीकार किया है। राजाराम कॉलेज, हाईस्कूल, गुरूकुल, अनाथालय, सरदार बोर्डिंग जैसे सभी संस्था मैंने आर्य प्रसारक सभा, संयुक्त प्रांत इन्हीं के अधीन इसी उद्देश्य से कर दिया है, कि लोगों का मानसिक परिवर्तन हो। यह परिवर्तन ज्ञान के द्वार से ही मुमकीन है, इसिलिए ज्ञान का सूत्र मैंने आर्यसमाज के हाथों सौप दी है। मुझसे जो हो सका वह मैंने कर दिया। मेरी यह इच्छा है कि मेरे जोतिबा, पंढरपुर जैसे क्षेत्रो में भी गुरूकूल, हाईस्कूल, की स्थापना करे। मेरा जो फर्ज था वह मैंने पूरा किया है।

आगे का जो भी फर्ज पूरी तरह से आपके हाथों में सौंपा है। अगर इससे भी वैदिक धर्म का प्रसार नहीं हुआ तो इसमें आर्य प्रचारक और आप सभी दोषी होंगे। मेरी इच्छा है कि, कुछ सच्चे कर्मवीर मेरी तरह इस कार्य के लिये अपना समय देंगे।

आर्य बंधुओ! हमसे आज भी कर्महीनता नष्ट नहीं हुई है। ऋषियों की प्रेरणा, शिक्षित समुदाय में दृष्टिगोचर हो रही है। देश की सभी समाज, सभा, सोसायटी वैदिक सिद्धांत के अनुसार अपना फर्ज निभा रही है।

यथेमां वाचं कल्याणिम्।

इस वेद की आज्ञा के अनुसार आर्य समाज ने गुरुकुल, अनाथालय, कॉलेज जैसी संस्था स्थापित करके भेदभावरहित सभी जाति व्यवस्था में वेद वाणी का प्रचार किया है। फिर भी हम आज भी ऋषियों के बहुत से लोग कर्मवीर नहीं बने हैं। अकर्म का यह समय नहीं तो कर्म करने का है।

उदाहरण के तौर पर पटेल बिल लिजिये! इस तरह हमें अपना वर्तन करने के लिये प्रारंभ करना चाहिये। वेद प्रतिपादित गुण कर्म के अनुसार हम कृति से वर्ण व्यवस्था का पालन कर रहे हैं, यह सिद्ध करने का समय आ गया है।

मैंने आपका बहुत समय लिया है। परंतु आप सभी ने ध्यानपूर्वक, उत्साह के साथ मेरा भाषण सुन लिया, इसलिये मैं आप सभी का फिर से तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूं। और अंत में आप सभी को सच्चे मन सें बड़ी विनय (नम्रता) पूर्वक बताना चाहता हूं कि, ऋषि दयानंद के कार्य का अपनी मन-दिल में प्रकाश पड़ा हो तो याद रखिए कि इस काठियावाड़ी भूमि में बाल मूलशंकर जी ने कठिन प्रतिज्ञा कर के गृहत्याग किया था, तो हम भी इस तीर्थस्थान से वापस जाते समय कठिन प्रतिज्ञा करेंगे कि वैदिक सिद्धांत और विचार हम कृति में लाने के लिये बिल्कुल भी पीछे नहीं हटेंगे।

बंधुओ! आखिर सत्य का ही विजय होता है, यह ध्यान में रखते हुए ऋषियों के इस कार्य को प्रसारित करने का प्रयत्न करो और इसी कार्य में लगे रहो। परमात्मा आपको शक्ति देगा क्योंकि जो कर्मवीर होते हैं, उन्हें सहायता करनेवाला वही ईश्वर है।

राजर्षि शाहू महाराज (26 जून 1874 –6 मई 1922) भोंसला वंश के कोहलापुर नरेश थे। आप प्रगतिशील विचारों के वैदिक धर्मी शासक थे। आपने अपना प्रेरणा स्रोत्र स्वामी दयानन्द सरस्वती जी को बताया है। आपने दलित छात्रों को छात्रवृति विदेश पढ़ने हेतु भेजा। डॉ अम्बेडकर उन्हीं छात्रों में से एक थे जिनके जीवन निर्माण में शाहू जी महाराज का अप्रतिम योगदान है।

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