महुवा के वृक्ष से प्राणी और पर्यावरण दोनो का संवर्धन ! पढ़े महुआ से क्या क्या लाभ होगा

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आदिकाल से महुवा के वृक्ष से प्राणीमहुवा के वृक्ष से प्राणी और पर्यावरण दोनो का संवर्धन
जोहार या महुआ!! 


आदिवासियों पर जब अकाल आया था तब आदिवासी महुआ खाकर ही जीवित रहे थे इस लिए जन्म से मरणोपरांत तक आदिवासियों के संस्कारों में महुआ के अर्क की धार डाली जाती है (जिसे लोग (सत्ता, प्रशासन और वो) दारू का नाम देकर बदनाम कर रहे हैं) धरती पर अनाज की खोज बहुत बाद में हुई थी अगर विश्वास न हो तो पुछो अपने 90 साल के बुजुर्ग दादा से पूछो कि आज से 100 साल पहले आदिवासी समाज क्या खाकर जिंदा था?”तो जवाब आयेगा महुआ! हमारा डाहला दादा बोलेगा
“हम महुआ खाकर जिंदा रहते थे”
ज्वार,मक्का,बाजरा और गैंहु तो बहुत बाद में आया।हमारे समाज को कुपोषण से बचाने वाला ये ही एक मात्र फल वनस्पति थी इसलिए ये हमारा पुरखा जीवन है जिसने हमारे पुरखो को हमारे बाप दादा को भी पाला है।जबतक महुआ देश में जिंदा है तबतक आदिवासी समाज भी जिंदा रहेगा।मेरे पिताजी कहते थे जो कुकडू, बुकडू और महूडू अवेरेगा ई आपनु काजे ये भूखों नी मरेगा (संभालेगा वो कभी दुखी नहीं होगा, सक्षम रहेगा
इसी साजिश के तहत महुए की कटाई और नफरत दोनों करवाई
महुए के फल की सब्जी, फूल का ज्यूस, सूखा सेक् कर खाया जाता है, उबाल कर खाया जाता है, इसके लड्डू,, ढोकला बनाया जाता है, फूल से अर्क और फल से तेल भी निकाला जाता है, पत्ते पशु खाते है, सुखी लकड़ी ईंधन के काम आती है, सबसे ज्यादा पक्षी निवास करते हैं और दिन को पशु इसकी छाया में आराम भी करते हैं.. एक पेड़ अनेक समाधान
अच्छी चीजों का इस्तेमाल खराब चीजों के लिए होता है तो इसका मतलब यह नहीं की वह चीज खराब है,जैसे अंगूर की शराब बनती हैं तो गलती अंगूर को नही बल्कि लोगो उसे बनाने वालो की है ! महुए के वृक्ष की उपयोगिता को देखते हुए देश उनसभी भूभागों में इसके वृक्ष लगाए जाने चाहिए जहां उगाया जा सकता है इससे प्राणी और पर्यावरण दोनो को बचाया और संवर्धन किया जा सकता है! और पर्यावरण दोनो का संवर्धन
जोहार या महुआ!!
आदिवासियों पर जब अकाल आया था तब आदिवासी महुआ खाकर ही जीवित रहे थे इस लिए जन्म से मरणोपरांत तक आदिवासियों के संस्कारों में महुआ के अर्क की धार डाली जाती है (जिसे लोग (सत्ता, प्रशासन और वो) दारू का नाम देकर बदनाम कर रहे हैं) धरती पर अनाज की खोज बहुत बाद में हुई थी अगर विश्वास न हो तो पुछो अपने 90 साल के बुजुर्ग दादा से पूछो कि आज से 100 साल पहले आदिवासी समाज क्या खाकर जिंदा था?”तो जवाब आयेगा महुआ! हमारा डाहला दादा बोलेगा
“हम महुआ खाकर जिंदा रहते थे”
ज्वार,मक्का,बाजरा और गैंहु तो बहुत बाद में आया।हमारे समाज को कुपोषण से बचाने वाला ये ही एक मात्र फल वनस्पति थी इसलिए ये हमारा पुरखा जीवन है जिसने हमारे पुरखो को हमारे बाप दादा को भी पाला है।जबतक महुआ देश में जिंदा है तबतक आदिवासी समाज भी जिंदा रहेगा।मेरे पिताजी कहते थे जो कुकडू, बुकडू और महूडू अवेरेगा ई आपनु काजे ये भूखों नी मरेगा (संभालेगा वो कभी दुखी नहीं होगा, सक्षम रहेगा
इसी साजिश के तहत महुए की कटाई और नफरत दोनों करवाई
महुए के फल की सब्जी, फूल का ज्यूस, सूखा सेक् कर खाया जाता है, उबाल कर खाया जाता है, इसके लड्डू,, ढोकला बनाया जाता है, फूल से अर्क और फल से तेल भी निकाला जाता है, पत्ते पशु खाते है, सुखी लकड़ी ईंधन के काम आती है, सबसे ज्यादा पक्षी निवास करते हैं और दिन को पशु इसकी छाया में आराम भी करते हैं.. एक पेड़ अनेक समाधान
अच्छी चीजों का इस्तेमाल खराब चीजों के लिए होता है तो इसका मतलब यह नहीं की वह चीज खराब है,जैसे अंगूर की शराब बनती हैं तो गलती अंगूर को नही बल्कि लोगो उसे बनाने वालो की है ! महुए के वृक्ष की उपयोगिता को देखते हुए देश उनसभी भूभागों में इसके वृक्ष लगाए जाने चाहिए जहां उगाया जा सकता है इससे प्राणी और पर्यावरण दोनो को बचाया और संवर्धन किया जा सकता है!

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