सादर नमस्ते!
आज हमारा देश आजाद है, और अब हम नित विकास पथ की ओर अग्रसर है । इस विकास की गति मे सब अपने-अपने सामर्थ्य से योगदान कर रहे है ताकि जो अभी भी अभावपूर्ण है वह भावपूर्ण होकर एक भारत श्रेष्ठ भारत का निर्माण हो सके । लेकिन इस एक भारत श्रेष्ठ भारत की संकल्पना को श्रीकृष्ण से लेकर आचार्य चाणक्य तक और आचार्य चाणक्य से लेकर ऋषिदयानंद पर्यन्त सभी ऋषि-मुनियों व क्रांतिकारी बलिदानियों से लेकर आज तक हर सच्चा भारतीय अपनी-अपनी बुद्धि समझ से निरंतर अखण्ड प्रचण्ड पुरूषार्थ के साथ लगा हुआ है। आज हमारी आजादी को पचहत्तर वर्ष हो गये है जिसको हम अमृतमहोत्सव के रूप मे मना रहे है । लेकिन इस आज़ादी से पूर्व देश सदियों की गुलामी से कमजोर पड़कर अपनी आभा, अपना तेज, अपना आत्मविश्वास, सब कुछ खो चुका था। प्रतिपल हमारे संस्कारों को, हमारे आदर्शों को, हमारे मूल्यों को चूर चूर करने की लाखों कोशिशें होती रहती थी। जब किसी समाज में गुलामी की हीन भावना घर कर जाती है, तो आध्यात्म और आस्था की जगह आडंबर आना स्वाभाविक हो जाता है।…..
हे पिता..!
क्या यह जनसमूह तुम्हे श्रद्धांजलि दे पाएगा? पर इन्हे तो तुम याद भी नहीं हो। किंतु हे पिता ! मुझे तुम्हारा ऋण याद है। कतरा कतरा इस भूमि के लिए, तुम्हारा स्वयं को जलाना याद है। मुझे याद हैं, तुम्हारी भिक्षा, तुम्हारी शिक्षा, तुम्हारी दक्षिणा, तुम्हारा दान…
मैं कृतज्ञ हूं पिता! मैं उऋण होना चाहता हूं। प्रणाम !!
युग प्रवर्तक, महर्षि दयानंद सरस्वती द्वि-जन्मशताब्दी पर उन्हें सश्रद्ध शतश: नमन।
मै ऋषि ऋण से उरीढ़ होना चाहता हूं
Prince vidyarthi
योगेश भारद्वाज







