क्या आप यज्ञ प्रेमी है..? यहा प्रस्तुत है यज्ञ की दो-दो लाईन की 26 वैदिक सुक्त, एक बार पढ़े अवश्य

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यज्ञ प्रेमियों के लिए यज्ञ के उत्कृष्ट सूक्तियां प्रस्तुत है ।

१. यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म ।। ( शतपथ ब्राह्मण )

यज्ञ दुनिया का सर्वश्रेष्ठ कर्म है ।

२. यज्ञो वै कल्पवृक्षः ।।

यज्ञ कामनाओं को पूर्ण करनेवाला है ।

३. ईजानाः स्वर्गं यन्ति लोकम् ।। ( अथर्ववेद १८.४.२)

यज्ञकर्त्ता स्वर्ग ( सुख ) को प्राप्त करते है ।

४. अग्निहोत्रं जुहूयात् स्वर्गकामः ।।

स्वर्ग की अभिलाषा रखने वाले व्यक्ति यज्ञ करें ।

५. होतृषदनम् हरितम् हिरण्यम् ।।

यज्ञ वाले घर धन – धान्य से पूर्ण होता है ।

६. यज्ञात् भवति पर्जन्यः ।।

यज्ञ से वर्षा होती है ।

७. इयं ते यज्ञियाः तनू ।।

ये तेरा शरीर यज्ञादि शुभ कर्मों के लिए है ।

८ . स्वर्ग कामो यजेत् , पुत्र कामो यजेत् ।।

स्वर्ग और पुत्र की कामना करनेवाले व्यक्ति यज्ञ करें ।

९. यज्ञं जनयन्त सूरयः ।। ( ऋग्वेद १०.६६.२)

हे विद्वान् ! संसार में यज्ञ का प्रचार करो ।

१०. यज्ञो वै देवानामात्मा ।। ( शतपथ ०)

यज्ञ देवताओं की आत्मा है ।

११. यज्ञेन दुष्यन्तो मित्राः भवन्ति ।। ( तै ० उप० )

यज्ञ करने वाले व्यक्ति के शत्रु भी मित्र बन जाते है ।

१२ . प्राचं यज्ञं प्रणयता सखायः ।। ( ऋग्वेद १०.१०१.२ )

१३. अयज्वानः सनका प्रेतमीयुः ( ऋग्वेद १.३३.४)

यज्ञ न करनेवाले उन्मत्त का सर्वनाश हो जाता है ।

१४. न मर्धन्ति स्वतवसो हविष्कृतम् ।। ( ऋग्वेद १. १६६ .२)

याज्ञिक को महाबली भी नहीं मार सकता ।

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१५. सजोषसो यज्ञमवन्तु देवाः ।। ( ऋग्वेद ३.८.८)

विद्वान् परस्पर प्रीतिपूर्वक यज्ञ की रक्षा करें ।

१७. यज्ञस्य प्राविता भव ।। ( ऋग्वेद ३.२१.३)

तू यज्ञ का रक्षक बन ।

१८. यज्ञो हित इन्द्र वर्धनो भूत् ।। ( ऋग्वेद ३.३२.१२)

हे जीव ! यज्ञ ही तुझे बढ़ाने वाला है ।

१९. यज्ञस्ते वज्रमहिहत्य आवत् ।। ( ऋग्वेद ३.३२.१२)

यज्ञरूपी वज्र पाप नाश में सफलता दिलाता है ।

२०. अयज्ञियो हतवर्चा भवति ।। ( अथर्ववेद १२.२.३७)

यज्ञ न करनेवाला का तेज नष्ट हो जाता है ।

२१. यज्ञो विश्वस्य भुवनस्य नाभिः ।। ( अथर्ववेद ९.१०.१४)

यज्ञ विश्व व ब्रह्माण्ड का केन्द्र है ।

२२. ईच्छन्ति देवाः सुन्वन्तम् ।। ( ऋग्वेद ८.२.१८)

यज्ञकर्त्ता को देवगण भी चाहते है ।

२३. अतमेरुर्यजमानस्य प्रजा भूयात् ।। ( यजुर्वेद १.२३)

हे ईश्वर ! यजमान की संतान संतापरहित हो ।

२४. स यज्ञेन वनवद् देव मर्तान् ।। ( ऋग्वेद ५.३.५)

प्रभु यज्ञकर्त्ता मनुष्य को देव बनाकर शक्तियुक्त कर देता है ।

२५. विश्वायुर्धेधि यजथाय देव ।। ( ऋग्वेद १०.७.१)

हे देव ! हमें सम्पूर्ण आयु यज्ञ के लिए दो ।

२६. यजस्व वीर ।। ( ऋग्वेद २.२६.२)

हे वीर ! तू यज्ञ कर ।

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