आध्यात्म : दूसरों के सारथी तो बने, परन्तु स्वार्थी ना बने, परोपकारी तो बने, परंतु शोषक ना बने

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यदि आप मे योग्यता है तो भाग्य नही बदल सकते ना सही मार्गदर्शन अवश्य करे

पढ़े लिखे बुद्धिमान प्रत्येक व्यक्ति में कुछ न कुछ विशेष प्रतिभा होती है। यदि वह कुछ वर्ष उस क्षेत्र में कार्य भी कर ले, तो उसमें अनुभव भी आ जाता है।

“ऐसी स्थिति में वह चाहे तो दूसरों का भाग्य बदल सकता है। यदि किसी में इतनी योग्यता आ गयी हो, तो अपनी योग्यता के माध्यम से, जो उसके रिश्तेदार संबंधी आदि मित्र गण हैं, वह उनका विशेष सहयोग करे।”

“यदि किसी व्यक्ति में सामान्य योग्यता हो, और वह दूसरे व्यक्तियों का भाग्य न भी बदल सकता हो, तो भी उन्हें कुछ तो मार्गदर्शन दे ही सकता है, जिससे कि दूसरों की भी यथाशक्ति यथासंभव उन्नति हो सके।”
अब जब दूसरे लोगों का आप मार्गदर्शन करेंगे, तब सावधान रहने की भी आवश्यकता है।

“अनेक बार लोग जब दूसरों का मार्गदर्शन करते हैं, तब उनका स्वार्थ उभर आता है, और वे उसी प्रवाह में बह जाते हैं। तब वे दूसरे की उन्नति को कम महत्व देते हैं तथा अपनी स्वार्थ सिद्धि को अधिक। इसका नाम “शोषण करना” है।” “इसलिए जब आप दूसरों को रास्ता दिखाएं , तब उनके “सारथी” तो अवश्य बनें, परंतु “स्वार्थी” न बनें।” “उनका उपकार करके परोपकारी तो बनें, परंतु परोपकार के बहाने से उनका शोषण न करें।”

ऐसा करना अन्याय पूर्ण होगा, और ईश्वर से इसका दंड भी अवश्य मिलेगा।
“इसलिए ईश्वर का दंड तो सदा याद रखें, सावधानी से कार्य करें, अपना और दूसरों का कल्याण करें।”

“स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात।”

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